न रोओ मेरी शहादत पर ,
मैं भी दुःखी हो जाऊंगा ,
सेना में आया तो सोचा ,
देश के काम मैं आऊँगा ।
माँ तूँ न रो इस शहादत पर ,
मैं तो वापस ना आऊँगा ,
बापू को समझा देना तू ,
मैं अब शहीद कहलाऊँगा ।
बहना तेरी राखी का तो ,
पूरा मोल चुकाने को ,
लगातार बजता मोबाइल
शहर में हुए धमाके
टी. वी. पर ब्रेकिंग न्य़ूज़
घबराए हुए चेहरे
दहशत का माहौल
मंडराता हुआ ख़ौफ का साया
ऐसा लगा कि आतंकवादी
बस मेरे करीब ही है।
अन्दर तक घबरा गई
दिमाग़ शांत नहीं
तस्वीरों ने हलचल मचा दी
क्यों प्रताड़ित करता है
मानव ही मानव को इतना
कि दुःखी होकर वो चीत्कार कर उठता है ।
ऐसा सब
जानबूझ कर किया जाता है,
या अनजाने में हो जाता है ?
ऐसा लगता है
सब जानबूझ कर मानव
स्वार्थों की पूर्ती के लिए करता है ।
एक निरीह अशक्त प्राणी
जो रेंगता हुआ निकट पँहुच चुका है मंज़िल के
किन्तु असफल दिख रहा है,
मंज़िल पाने में,
उसका भविष्य क्या होगा ?
तेज़ हवा
क्या उसका रास्ता रोक देगी ?
पानी
क्या उसे बहाकर ले जाएगा ?
या फिर